या भारतात बंधुभाव नित्य बसू दे
या भारतात बंधुभाव नित्य बसू दे।
या भारतात बंधुभाव नित्य वसू दे।
दे वरचि असा दे॥धृ॥
हे सर्व पंथ संप्रदाय एक दिसू दे।
मतभेद नसू दे॥१॥
सकलांस कळो मानवता, राष्ट्रभावना।
ही सर्व स्थळी मिळुनी समुदाय-प्रार्थना
उद्योगी तरुण शीलवान येथे दिसू दे॥२॥
जातीभाव विसरूनिया एक हो आम्ही।
अस्पृश्यता समूळ नष्ट हो जगातुनी।
खलनिंदका मनींही सत्य न्याय वसू दे॥३॥
सौंदर्य रमो घराघरात स्वर्गियापरी।
ही नष्ट होऊ दे विपत्ति भीतीबावरी
तुकड्यास सदा या सेवेमाजि बसू दे॥४॥

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