13. बिंदु, रेखाखंड, रेखा, किरण,कोण
घटक 3 : भूमिती
उपघटक -3.1 : बिंदु, रेखाखंड, रेखा, किरण,कोण
(सरलकोण शन्यकोण पर्णकोण. बृहद्कोण) प्रतल, शीर्षाभिमुखकोण, संलग्नकोण, संपूरककोण, कोटिपूरक कोण.)
इसे जानें
♦ बिंदु : संलग्न आकृति में A, B, C बिंदु दिखाए गए हैं।
A.• B.• C. •
♦ रेखाखंड : संलग्न आकृति में रेख AB और रेख PQ यह रेखाखंड है।
रेख AB के बिंदु A व बिंदु B यह अंतबिंदु हैं।
रेखाखंड को संक्षेप में रेख लिखते हैं। रेखाखंड की लंबाई नापी जा सकती है।
♦ रेखा : संलग्न आकृति में रेखा AB, रेखा PQ दिखाई गई है। वे एक दूसरे को O बिंदु पर प्रतिच्छेदित करती हैं।
1) एक बिंदु से होकर जानेवाली असंख्य रेखाएँ खींची जा सकती हैं।
2) दो भिन्न बिंदुओं से होकर जानेवाली एक और केवल एक ही रेखा खींची जा सकती है।
3) तीन अथवा तीन से अधिक बिंदु एक सीधी रेखा पर होते हैं तो उन्हें एकरेखीय बिंदु कहते हैं।
4) जब तीन अथवा अधिक बिंदु एक सीधी रेखा पर नहीं होते, उन्हें अरैखिक बिंदु कहते हैं।
5) एक-दूसरे को प्रतिच्छेदित करनेवाली दो रेखाओं का प्रतिच्छेदन एक और केवल एक बिंदु ही रहता है।
6) एक ही प्रतल में स्थित तथा एक-दूसरे को प्रतिच्छेदित न करनेवाली रेखाओं को समांतर रेखाएँ कहते
7) तीन या तीन से अधिक रेखाएँ एक ही बिंदु पर एक-दूसरे को प्रतिच्छेदित करती हैं, तो इन रेखाओं को संगामी रेखाएँ कहते हैं तथा इनके प्रतिच्छेदन बिंदु को संगमनबिंदु कहते हैं।
♦ किरण : संलग्न आकृति में किरण PR तथा किरण AB दिखाए गए हैं। इन किरणों के बिंदु P व बिंदु A यह आरंभ बिंदु हैं।
♦ विपरित किरण : जब दो किरणों का आरंभबिंदु एक ही हो तथा उनकी दिशा परस्पर विरुद्ध होते हैं, उन किरणों को विपरित किरण कहा जाता है।
♦ कोण :
दी गई आकृति में किरण BC तथा किरण BA का आरंभ बिंदु सामान्य है। बिंदु
B को ∠ ABC का शीर्षबिंदु कहते हैं। किरण BA तथा किरण BC यह कोण की भुजाएँ हैं। कोण ∠ABC को संकेत में ∠ABC अथवा ∠CBA लिखा जाता है।
कोण के निम्नलिखित प्रकार हैं।
1) 90° से अधिक तथा 180° से कम मापवाले कोण को अधिक कोण कहते हैं।
2) 90° के कोण को समकोण कहते हैं।
3) 0° से अधिक 90° से कम मापवाले कोण को न्यनकोण कहते हैं।
4) 180° के कोण को सरलकोण कहते हैं।
5) 0° के कोण को शून्य अंश कोण कहते हैं।
6) जिस कोण की एक भुजा पूरी 360° से घूमती है, उस कोण को पूर्ण कोण कहते हैं।
7) 180° से अधिक तथा 360° से कम मापवाले कोण को प्रतिवर्तीकोण कहते हैं।
प्रतल : अल टबल का पृष्ठभाग, या दीवार के पृष्ठभाग से हम प्रतल की संकल्पना स्पष्ट कर सकते है
1) प्रतल सभी दिशाओं में असीमित होता है।
2) प्रतल निश्चित करने के लिए तीन बिंदुओं की जरूरत होती है।
3) एक रेखा तथा उस रेखा के बाहर का एक बिंदु से एक प्रतल निश्चित होता है।
कोणों की जोड़ियाँ :
कोटिपूरक कोण : जिन दो कोणों के मापों का योगफल 90° हो उन कोणों को एक-दूसरे का कोटिपूरक कोण कहते हैं।
संपूरक कोण : जिन दो कोणों के मापों का योगफल 180° हो, उन्हें एक-दूसरे का संपूरककोण कहते हैं।
संलग्न कोण (आसन्न कोण) : जिन दो कोणों की एक भुजा सामान्य होती है तथा उन कोणों के अंतर्भाग अलग-अलग होते हैं उन दो कोणों को संलग्न कोण कहते हैं।
रेखीय युगल कोण : जिन दो संलग्न कोणों की असामान्य भुजाएँ विपरीत किरणें हैं, तो उन संलग्न कोणों को रेखीय युगल कोण कहते हैं। रेखीय युगल कोणों के मापों का योगफल 180° होता है। वे संपूरक कोण भी हैं।
शीर्षाभिमुख कोणों की जोडी : दो कोणों की भुजाएँ यदि परस्पर विपरीत किरणें हों तो इन दो किरणों से बने । कोणों की जोड़ी को शीर्षाभिमुख कोण कहते हैं। शीर्षाभिमुख कोणों के माप एकसमान होता है।
अंत: खंड/तिर्यक रेखा : आकृति में रेखा L व रेखा M की रेखा N तिर्यक रेखा है।
रेखाखंड AB यह तिर्यक रेखा N पर निर्मित अंत:खंड है। तिर्यक रेखा, प्रतिछेदनबिंदु के पास (A तथा B) कुल 8 कोण निर्मित करते हैं।
- संगत कोणों की जोडियाँ : ∠a तथा ∠e, ∠ b तथा ∠ f, ∠ d तथा ∠ h, ∠c व ∠g ! यह संगत कोणों की जोडियाँ हैं।
- एकांतर कोणों की जोडियाँ : ∠d तथा ∠f एवं ∠ c तथा ∠e यह एकांतर कोणों की जोडियाँ हैं।
- अंत:कोणों की जोडियाँ : ∠d तथा ∠e एवं ∠c व ∠f यह अंतःकोणों की जोड़ी है।
समांतर रेखाओं के तिर्यक रेखा द्वारा बननेवाले कोणों की जोडी :
1) दो समांतर रेखाओं की तिर्यक रेखा से निर्मित संगतकोण सर्वांगसम होते हैं।
2) दो समांतर रेखाओं की तिर्यक रेखा से निर्मित अंत:कोण संपूरक होते हैं।
3) दो समांतर रेखाओं की तिर्यक रेखा से निर्मित होनेवाले एकांतर कोण सर्वांगसम होते हैं।
समांतर रेखा :
1) एक ही प्रतल में एक-दूसरे को प्रतिच्छेदित न करनेवाली रेखा को समांतर रेखा कहते हैं।
2) एक ही रेखा के समांतर खींची गई सभी रेखाएँ एक दूसरे के समांतर होती हैं।
3) एक ही रेखा पर खींची गई लंब रेखाएँ समांतर होती हैं।
4) किन्हीं तीन समांतर रेखाओं द्वारा एक ही प्रतिच्छेदन रेखा पर निर्मित अंत:खंडों की लंबाइयों का अनुपात और उन्हीं समांतर रेखाओं द्वारा किसी अन्य तिर्यक रेखा पर निर्मित अंत:खंडों की लंबाइयों का अनुपात समान होता है।
5) तीन समांतर रेखाओं से किसी तिर्यक रेखा या दो अंत:खण्डों की लंबाइयों का अनुपात तथा उन रेखाओं के दवारा किसी भी तिर्यक रेखा पर बने संगत अंत:खण्डों की लंबाई का अनुपात दोनों बराबर होते हैं।
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