१७. उपसर्ग, प्रत्यय, कृदंत 

 

उपघटक - उपसर्ग, प्रत्यय, कृदंत 

इसे जानें

उपसर्ग : उपसर्ग भाषा के वे सार्थक लघुखंड हैं, जो शब्द के आरंभ में लगकर नए शब्द का निर्माण करते हैं। जैसे- अन् + आदर = अनादर, सु + योग = सुयोग, प्र + हार = प्रहार, अति + अधिक = अत्यधिक, अप + यश = अपयश, सम + कोण = समकोण

प्रत्यय : भाषा के वे लघुतम सार्थक खंड जो शब्द में अंत के जुड़कर नए शब्द का निर्माण करते हैं। प्रत्यय कहलाते हैं। जैसे- लेनदार, होनहार, कथनीय, डिबिया, धनवान, कृपालु, मेहनताना, अभिमान,

कृदंत : क्रिया या धातु के अंत में लगनेवाले प्रत्यय को ‘कृत' प्रत्यय कहते हैं। यह प्रत्यय लगने पर जो शब्द बनता है उसे कृदंत कहते हैं। इसके दो भेद हैं- 1) विकारी 2) अविकारी

1) विकारी कृदंत : विकारी कृदंतों का प्रयोग प्रायः संज्ञा या विशेषण के समान होता है। जैसे- उड़ती चिड़िया, बहता जल। विकारी कृदंत के चार प्रकार हैं।

1) क्रियार्थक संज्ञा : धातु के अंत में 'ना' जोड़ने से क्रियार्थक संज्ञा बनती है। जैसे- उठ-उठना, पढ-पढना. बैठ-बैठना।

2) कर्तृवाचक कृदंत : क्रियार्थक संज्ञा के विकृत रूप के अंत में ‘वाला' जोड़ने से कर्तृवाचक कृदंत बनता है। जैसे- गानेवाला, लिखनेवाला, पढ़नेवाला।

3) वर्तमानकालिक कृदंत : धातु के अंत में 'ता', 'ती', 'ते' लगाने से वर्तमानकालिक कृदंत बनता है। जैसे- मर-मरता, पढ़-पढ़ती, डूब-डूबते, हँस-हँसते।

4) भूतकालिक कृदंत : धातु के अंत में 'आ' लगाने से भूतकालिक कृदंत बनता है। जैसे- बोल-बोला, कह-कहा, ला-लाया।

भूतकालिक की रचना नीचे दिए गए नियम के अनुसार होती है -

1) अकारांत धातु के अंत में 'अ' के स्थान पर 'आ' कर दिया जाता है। जैसे- कह-कहा, लिख-लिखा।

2) धातु के अंत में 'आ', 'ए' अथवा 'ओ' हो तो धातु के अंत में 'या' जोड़ दिया जाता है। जैसे ला-लाया, बो-बोया, सो-सोया।

3) यदि धातु के अंत में 'ई' हो तो उसे हस्व करके उसके आगे 'या' लगाया जाता है। जैसे- पी-पीना, सी-सिया।

4) ऊकारांत धातु के 'ऊ' को हस्व करके उसके आगे ‘आ' लगाया जाता है। जैसे-छूना-छुआ, चूना-चुआ।

5) कुछ उदाहरण अपवाद हैं। जैसे- जाना-गया, करना-किया, देना-दिया।

6) भूतकालिक कृदंत ने साय प्रायः 'हुआ' लगाया जाता है। जैसे- लिखा हुआ, पढ़ा हुआ, गाया हुआ।

2) अविकारी कृदंत : अविकारी कृदंत का प्रयोग क्रिया विशेषण और कभी-कभी संबंधबोधक के रूप में किया जाता है। इस के चार भेद हैं - 

1) पूर्वकालिक कृदंत – पूर्वकालिक कृदंत धातु के रूप में होते हैं, अथवा धातु के अंत में 'के', 'कर' या 'करके' जोड़ने से बनता है। जैसे

जा - जाके, जाकर, जा करके

पढ़ - पढ़ने, पढ़कर, पढ़ करके

2) तात्कालिक कृदंत - वर्तमान कालिक कृदंत के ‘ता' को 'ते' में बदलकर आगे आगे 'ही' लगाने से तात्कालिक कृदंत बनता है। जैसे -

गिर-गिरते ही, निकल-निकलते ही।

3) अपूर्ण क्रियायोतक कृदंत - वर्तमानकालिक कृदंत में 'ता' को 'ते' में परिवर्तित करके अपूर्ण क्रियादयोतक कृदंत बनाया जाता है। इस कृदंत के आगे प्रायः 'हुए' लगाया जाता है। जैसे -

हँस-हँसते हुए, पढ़-पढ़ते हुए।

4) पूर्ण क्रियाद्योतक कृदंत - भूतकालिक कृदंत के अंतिम ‘आ' अथवा 'या' को 'ए' में परिवर्तित किया जाता है।

जैसे -

हुआ-हुए, खाया-खाए।

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