११. कहावते
उपघटक 2.7 कहावते |
इसे जानें - ☞ समाज में प्रचलित कहावतों को लोकोक्तियाँ कहते हैं। वास्तव में इन लोकोक्तियों में समाज के सदियों के अनुभव संचित होते हैं। लोकोक्ति के प्रयोग से भाषा में जान आ जाती है, वह प्रभावपूर्ण तथा रोचक बन जाती है। लोकोक्ति मुहावरे की तरह वाक्यांश न होकर पूर्ण वाक्य ही होती है। कहावतों में उनके मूल अर्थ तो होते ही हैं, साथ ही उन अर्थों में लाक्षणिकता भी रहती है। |
1.अंधों में काना राजा (अयोग्य व्यक्तियों में कम योग्य व्यक्ति भी श्रेष्ठ बन जाता है)-गाँवों में टूटी-फूटी अंग्रेज़ी
बोलनेवाला भी बाबू समझा जाता है। क्यों न हो, अंधों में काना राजा जो ठहरा। - - .
2. अंधा बाँटे रेवड़ी, फिर-फिर अपनों को दे (अन्याय करना)-सौतेली माँ ने पकौड़े बनाकर बाँटे तो सही, लेकिन
राजू को तो एक भी नहीं दिया। सच है, अंधा बाँटे रेवड़ी फिर-फिर अपनों को दे।
3. अधजल गगरी छलकत जाए (ओछा व्यक्ति बहुत बढ़ा-चढ़ा कर अपनी प्रशंसा करता है)-आता-जाता कुछ नहीं,
लेकिन अपने-आप को श्रेष्ठ बताने का प्रयत्न कर रहे हो। सच है, अधजल गगरी छलकत जाए।
4. अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता (कोई भी बड़ा काम अकेले व्यक्ति से नहीं हो सकता)-अन्याय के खिलाफ
आवाज़ उठाते हुए व्यक्ति को सभी ने नज़रअंदाज़ कर दिया। सच है, अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता।
5. अब पछताए होत क्या जब चिड़ियाँ चुग गई खेत (समय बीत जाने पर पछताने से कोई लाभ नहीं)-राजू के
परीक्षा में फेल हो जाने पर, पिता ने सांत्वना देते हुए कहा, “अब पछताए होत क्या, जब चिड़ियाँ चुग गईं खेत।"
6. आम के आम गुठलियों के दाम (किसी भी कार्य में दुगना लाभ)-इस बार छुट्टियों में तुम अपने चाचा जी के
यहाँ नैनीताल चले जाओ .. वा जी से मिलना भी हो जाएगा और पहाड़ों की सैर भी। सच है, आम के आम और
गुठलियों के दाम।
7. आप भला तो जग भला (यदि हम अच्छे हैं तो सब हमारे साथ अच्छा व्यवहार करेंगे)-यदि आप दूसरों के
साथ सच्चाई, स्नेह और सज्जनता का व्यवहार करोगे, तो कोई भला आपको क्यों परेशान करेगा। सुना नहीं है, आप
भला तो जग भला।
8. आधी छोड़ सारी को धावे, आधी रहे न सारी पावे (अधिक लालच से हानि होती है)-तम नौकरी से भी जुड़ रहना चाहते हो और अपना व्यवसाय भी करना चाहते हो, यह संभव नहीं है। जानते हो न, आधी छोड़ सारी को धाव,
आधी रहे न सारी पावे।
9. उलटा चोर कोतवाल को डाँटे (गलती अपनी और धमकाना दूसरों को)-चोरी करते हुए जब घर का
राजीव को पकड़ लिया तो राजीव खुद चोर-चोर की आवाज़ लगाकर नौकर पर झपट पड़ा। ये तो वहा बार
उलटा चोर कोतवाल को डाँटे।
10. ऊँची दुकान फीका पकवान (बड़ी प्रसिद्धि वाले प्रायः ओछा आचरण करते हैं)-नगर के सबसे बड़ा
दावत में मिष्ठान न देखकर लोगों से रहा न गया। वे बोले, ऊँची दुकान फीका पकवान।
11. ऊँट मुँह में जीरा (जरूरत से बहुत कम)-परिवार में खाने वाले दस लोग हैं और कमाने वाला एक। पता ही नहीं चलता सारी तनख्वाह कहाँ चली जाती है। ये तो ऊँट के मुँह में जीरा वाली बात हुई।
12. ऊधो का लेना न माधो का देना (किसी का न लेना न देना)-रहीम हमेशा अपने काम में व्यस्त रहता है। यहाँ-वहाँ, तांक-झाँक नहीं करता। उसे क्या, ऊधो का लेना न माधो का देना।
13 .एक हाथ से ताली नहीं बजती (किसी भी कार्य के लिए दो पक्षों का होना अनिवार्य है)-बेवजह किसी से लड़ाई होना असंभव है, क्योंकि एक हाथ से ताली नहीं बजती।
14. एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं (एक स्थान पर दो प्रतिद्वंद्वी नहीं रह सकते)-छोटा भाई बड़े भाई से बोला-"या तो आप ही इस दुकान पर बैठिए या मैं ही बैलूं, एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं।"
15. एक अनार सौ बीमार (वस्तु थोड़ी और चाहने वाले अधिक)-एक रिक्त स्थान के लिए अनेक आवेदन-पत्र आने पर अधिकारी बोला-"किसे रखें, किसे मना करूँ" एक अनार सौ बीमार।
16. एक थैली के चट्टे-बट्टे (सब एक समान)-राजू अपने-आप को शरीफ़ दिखाने का प्रयत्न करता है, लेकिन वह रमेश और रोहित से कम नहीं है। ये सभी एक थैली के चट्टे-बट्टे हैं।
17. एक तो करेला दूसरा नीम-चढ़ा (स्वाभाविक दोष में अन्य दोष)-सुमित बड़ा घमंडी लड़का है। भगवान ने उसे रईस जो बना दिया है। एक तो करेला दूसरा नीम-चढ़ा।
18. एकै साधे सब सधे, सब साधे सब जाए (एक साथ कई काम उठा लेने पर कोई भी काम पूरा नहीं हो सकता) सुधा सोचती है कि वह नौकरी भी कर लेगी, घर भी संभाल लेगी और बाजार के काम भी निपटा लेगी, लेकिन यह संभव नहीं, क्योंकि एकै साधे सब सधे, सब साधे सब जाए।
19. ओस चाटे प्यास नहीं बुझती (थोड़ी वस्तु से अधिक चाहने वाले की संतुष्टि नहीं होती)-खुराक तो उसकी दस रोटी है। यदि तुम उसे केवल दो ही रोटी खाने को दोगी तो कैसे चलेगा? ओस चाटे प्यास नहीं बुझती।
20. ओछे की प्रीत बालू की भीत (तुच्छ व्यक्ति के साथ मित्रता नहीं निभ सकती)-श्याम ने अपनी नौकरानी के बेटे से दोस्ती तो की, लेकिन दूसरे ही रोज़ उसके कमरे से सौ रुपये चोरी हो गए। सच ही है, ओछे की प्रीत बालू की भीत जैसी होती है।
21. ओखली में सिर दिया तो मूसलों से क्या डरना (विपत्ति झेलने को तैयार रहना)-जब सर पर पूरे घरभर की
ज़िम्मेदारी ली है, तो घबराना कैसा। ओखली में सिर दिया तो मूसलों से क्या डरना।
22. कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमती ने कुनबा जोड़ा (इधर-उधर की अनमेल वस्तुओं को एकत्र करना)-भारत के विभिन्न राजनीतिक दल अपनी विभिन्न विचारधाराओं को व्यक्त करते हैं, परंतु राष्ट्रीय एकता उनमें कूट-कूटकर भरी है, मानो कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमती ने कुनबा जोड़ा।
23. कभी नाव गाड़ी पर और कभी गाड़ी नाव पर (परिस्थिति सदा एक-सी नहीं रहती)-एक मित्र ने दूसरे मित्र को दिलासा देते हुए कहा कि क्या हुआ जो इस बार व्यवसाय में घाटा हो गया, ऐसा तो होता ही रहता है। कभी नाव गाड़ी पर और कभी गाड़ी नाव पर।
24, का वर्षा जब कृषि सुखाने (समय निकल जाने पर प्रयत्न करना व्यर्थ है)-घर में चोर घुस आने पर घर वालों ने पुलिस को फ़ोन किया। पुलिस उस समय आई जब चोर सभी को चकमा देकर भाग निकला। अब पुलिस वाले उसकी छानबीन कर रहे हैं। का वर्षा जब कृषि सुखाने।
25. काला अक्षर भैंस बराबर (अशिक्षित या निरक्षर)-ग्रामीण लोग गीता या पुराण की बातें क्या जानें। उनके लिए तो काला अक्षर भैंस बराबर है।
26. काठ की हाँडी बार-बार नहीं चढ़ती (धोखा एक बार ही खाया जा सकता है जा सकता है)-पिछली बार तो दुकानदार ने कपडे की झूठी तारीफ़ कर उसे थमा दिया था. लेकिन इस बार ऐसा नहीं होगा। काठ की हाँडी बार-बार नहीं चढ़ती।
27. कोई ओढ़े शाल दुशाला, कोई ओढे कंबल काला (सभी का भाग्य एक-सा नहीं होता)-आज के युग में भी अमीरी-गरीबी की खाई समाप्त नहीं हई है। एक झोपडी में रहता है तो दूसरा महल में । इसी को कहते हैं-कोई ओढे शाल दुशाला, कोई ओढ़े कंबल काला।
28. कोयले की दलाली में हाथ काले (बरे की संगति से बुराई ही मिलती है)-बदनाम दोस्त की संगति में रहने के कारण राहुल का भी तिरस्कार होने लगा। सच है, कोयले की दलाली में हाथ तो काले होंगे ही।
29. कोठी में अनाज घर में उपवास (कृपण व्यक्ति सब कुछ होते हुए भी भूखा रहता है)-रमेश तथा उसका परिवार जब देखो तब अभाव की बातें करते हैं। सब कुछ होते हुए तन पर ढंग के कपड़े भी नहीं पहनते। सच है, कोठी में अनाज घर में उपवास।
30. कौड़ी नहीं पास मेला लगे उदास (धन के अभाव में कुछ भी अच्छा न लगना)-दोस्तों के द्वारा बार-बार आग्रह करने पर भी राजेश उनके साथ पिक्चर देखने व खाना खाने नहीं गया, क्योंकि उसकी जेब खाली थी। सच है, कौड़ी नहीं पास मेला लगे उदास।
31. खग जाने खग की भाषा (मूर्ख ही मूर्ख के अवगुणों को जानता है)–नेता द्वारा अन्य नेताओं पर टिप्पणी करते देख श्रोता बोल उठे, 'खग ही जाने खग की भाषा।'
32. खरी मजूरी चोखा काम (अच्छी मजदूरी अच्छा काम)-राधेश्याम अपना काम पूरी ईमानदारी से करता है। जैसा काम करता है वैसे ही पैसे लेता है। उसका तो एक ही उसूल है, खरी मजूरी चोखा काम।
33. खुदा गंजे को नाखून न दे (आततायी को पूर्ण शक्ति न मिले)-कालू दादा अब की बार चुनाव में खड़ा हुआ था। यह तो अच्छा हुआ कि वह हार गया अन्यथा उसकी क्रूरता को और भी शक्ति मिल जाती, खुदा गंजे को नाखून न दे।
34. खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे (लज्जित होकर दूसरे पर गुस्सा करना)-घर में जब माँ ने पिटाई की तो वहाँ तुम कुछ न बोल सके और बाहर आकर हम पर सवार हो रहे हो। सच है, खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे।
35. खोदा पहाड़ निकली चुहिया (अधिक परिश्रम, कम लाभ)-संदीप ने दिन-रात मेहनत की, फिर भी व्यापार में असफल रहा। यह तो वही बात हुई, खोदा पहाड़ निकली चुहिया। 1
36.गए थे रोज़ा छुड़ाने,गले पड़ी नमाज़ (सुख के बदले दुख मिला)-मन की परेशानी लेकर दोस्त के यहाँ गए थे। सोचा था कि वहाँ थोड़ा आराम मिलेगा, लेकिन वहाँ भी बिना मतलब लड़ाई हो गई। यह तो वही बात हुई, गए थे, रोज़ा छुड़ाने, गले पड़ी नमाज़।
37. गोद में लड़का, नगर में ढिंढोरा (नज़दीक मिलनेवाली वस्तु के लिए व्यर्थ ही दर तक परेशान होना)-श्याम अपने में ढिंढोरा। घर में ही छिपा हुआ था और उसकी माँ आस-पड़ोस में उसे ढूँढ़ रही थी। ये तो वही बात हुई, गोद में लड़का, नगर में ढिंढोरा ।
38. घर का जोगी जोगड़ा, आन गाँव का सिद्ध (परिचित योग्य व्यक्ति की कोई कद्र नहीं. पर अपरिचित को पूरा सम्मान)-राजू का सौतेला भाई डॉक्टर है, लेकिन घर में कोई उसे नहीं पूछता सभी दसरे डॉक्टर से इलाज करवात हैं। यह तो वही बात हुई, गाँव का जोगी जोगड़ा, आन गाँव का सिद्ध।
39. घर का भेदी लंका ढाए (घर का भेद बताने वाला ही सबसे बड़ा शत्रु होता है। देश को बाहय से ज्यादा आतारक विश्वासघातियों से सजग रहना चाहिए। कहीं ऐसा न हो घर का भेदी लंका ढाए।
40. घर में नाहीं बोरिया सपने आई खाट (किसी को ऐसी वस्तु प्राप्त हो जाए जो उसने कभी न देखी हो)- राजू ने सुरश से कहा कि भाई तुम तो अपने नाना की जायदाद पाकर बड़े ही इतराने लगे हो। तम्हारी तो वही बात है, घर म नाहीं बोरिया सपने आई खाट।
41. घी कहाँ गया, खिचड़ी में (अपनी चीज़ अपने ही काम आना)-विवाह पर ससुर ने बहू को पचास तोला सोना कर अपनी शान दिखाने का प्रयत्न किया। लेकिन घी कहाँ गया, खिचड़ी में, यही सबका कहना था।
42 चमडी जाए पर दमड़ी न जाए (किसी भी हालत में खर्च न करना)-सुरेश इतना कंजूस है कि कभी घर नहीं बलाता। उसका तो यह हाल है कि चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए।
43. चार दिन की चाँदनी फिर अँधेरी रात (धन, यौवन, सौंदर्य आदि क्षणिक वस्तुएँ हैं)-मनुष्य को अपने धन-यौवन का घमंड नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये आज हैं कल नहीं अर्थात् चार दिन की चाँदनी फिर अँधेरी रात।
44. चिराग तले अँधेरा (दूसरों को उपदेश देने वाले स्वयं अच्छा आचरण नहीं करते)-तुम सबको तो हिंदी सीखने का उपदेश देते हो, पर स्वयं अपने बच्चों को अंग्रेजी पढ़वाते हो। सच है, चिराग तले अँधेरा।
45. चिकने घड़े पर पानी नहीं ठहरता (निर्लज्ज व्यक्ति पर किसी बात का प्रभाव नहीं पड़ता )-आजकल की युवा पीढ़ी को कितना ही समझाओ, उस पर कोई असर नहीं होता। सच है, चिकने घड़े पर पानी नहीं ठहरता।
46. चोर-चोर मौसेरे भाई (एक-सी आकृति और पेशे के लोगों में जल्दी मेल-जोल हो जाता है)-दिनेश और राकेश पहली बार मिले और आपस में गहरे दोस्त हो गए। दोनों का पेशा जो एक है। सच है, चोर-चोर मौसेरे भाई।
47. चोर चोरी से जाए पर हेरा-फेरी से न जाए (किसी का स्वाभाविक गुण नहीं जाता)-जेल से सज़ा काटकर आने पर भी सुरेश की हरकतों में कोई परिवर्तन नहीं आया। सच है, चोर चोरी से जाए पर हेरा-फेरी से न जाए।
48. जब तक साँस, तब तक आस (अंत समय तक आशा बनी रहती है)-यूँ ही निराश हो जाने से जिंदगी नहीं चलती। मनुष्य को जब तक साँस, तब तक आस रखनी चाहिए।
49. जहाँचाह वहाँ राह (इच्छा होने पर उसको पाने का मार्ग स्वयं मिल जाता है)-यदि मनुष्य चाहे तो कठिन से कठिन कार्य भी पूरा कर सकता है, क्योंकि जहाँ चाह वहाँ राह।
50. जान है तो जहान है (जीवन सबसे अधिक मूल्यवान है)- व्यवसाय में घाटा हो जाने मात्र से आत्महत्या के बारे में सोचना गलत है, क्योंकि जान है तो जहान है।
51, जाके पाँव न फटी बिवाई सो क्या जाने पीर पराई (जब तक स्वयं अनुभव न हो तब तक दूसरे का कष्ट समझ में नहीं आता)-दो दिन यदि खाना न मिले तो क्या पीड़ा होती है, यह किसी अमीर आदमी को कैसे पता चलेगा! क्योंकि जाके पाँव न फटी बिवाई सो क्या जाने पीर पराई।
52. जिसकी लाठी उसकी भैंस (बलवान सब कुछ कर सकता है)-चाहे मनुष्य ने कितनी ही तरक्की क्यों न कर ली हो फिर भी धन और कुर्सी के बल पर लोग बड़े-बड़े कार्य करवा लेते हैं। आज भी जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत सच साबित हो रही है।
53. जितने मुँह उतनी बातें (ऐसी अफ़वाह जिसमें एक कथन दूसरे से भिन्न हो)-कोई कहता है कि उसकी हत्या हुई, कोई कहता है कि उसने आत्महत्या की। सत्य का पता नहीं लगता, जितने मुँह उतनी बातें।
54. जिस पत्तल में खाना उसी में छेद करना (कृतघ्न होना)-रामू ने नौकर बनकर जिस घर में काम किया उसी घर से वह पाँच हजार रुपये लेकर भाग गया अर्थात् जिस पत्तल में खाया उसी में छेद किया।
55. जैसा करेगा वैसा भरेगा (जो अपराध करेगा वही दंड भुगतेगा)-भ्रष्टाचार के आरोप में अमित को निलंबित कर दिया गया। सच है, जो जैसा करेगा, वैसा भरेगा। 56. जो गरजते हैं सो बरसते नहीं (जो बात अधिक करता है वह कार्य नहीं करता)-आजकल के नेता लोग बड़े-बड़े वादे करते हैं पर उन्हें पूरा नहीं करते हैं, सच है, जो गरजते हैं सो बरसते नहीं।
57. छठी का दूध याद करना (बुरा हाल होना)-शेयर के भाव गिरते ही रमेश को छठी का दूध याद आ गया।
58. छोटे मुंह बड़ी बात करना (बढ़-चढ कर बातें करना)-जेब में तो दो रुपये नहीं और हजारों की बातें करता है। सभी जानते हैं कि छोटे मुँह बड़ी बात करता है। 59. झूठ के पाँव नहीं होते (झठा व्यक्ति वाद-विवाद में हार जाता है)-राजेश को झूठ बोलने की ऐसी बुरी आदत पड़ गई है कि जहाँ देखो वहीं बहस करने लग जाता है। वह यह नहीं जानता कि इस तरह वह कभी सफल नहीं हो सकता, क्योंकि झूठ के पाँव नहीं होते।
60. झोंपड़ी में रहना और महल का सपना देखना (असंभव बातों को सोचना)-खाने को तो घर में दाना नहीं है और लोगों को दावत देने की सोच रहा है। ये सब रइसों के चोंचले हैं। सच है, झोपड़ी में रहना और महल का सपना देखना।
61.डूबते को तिनके का सहारा (असहाय को थोड़ा सहारा भी बहुत होता है)-व्यवसाय में पूरी तरह असफल हो जाने के बाद अब दिनेश को छोटी-सी नौकरी मिल गई। मानो डूबते को तिनके का सहारा मिल गया हो।
62. तलवार की धार (कठिन काम)-अंग्रेजों को भारत से निकाल बाहर करना तलवार की धार पर चलने के बराबर था।
63. तन सुखी तो मन सुखी (स्वास्थ्य से ही मन प्रसन्न रहता है)-यदि पास में बहुत-सा धन हो और शरीर स्वस्थ न हो तो मन खुश नहीं रह सकता, क्योंकि स्वास्थ्य ही सच्चा धन है और फिर कहा भी गया है कि तन सुखी तो मन सुखी।
64. तुरंत दान महा कल्याण (नकद सौदा करने में अधिक लाभ रहता है)-मुझे किसी से उधार वस्तु लेना अच्छा नहीं लगता। क्या फायदा? उससे तो अच्छा है तुरंत दान महा कल्याण।
65. तू डाल-डाल तो मैं पात-पात (विपक्षी से बढ़कर कौशल दिखाना)-तुम यदि मुझे हराने की सोच रहे हो तो यह संभव नहीं है। तुम डाल-डाल तो मैं पात-पात। 66. तेली का बैल (एक ही स्थिति में चलने वाला)-मनोज को देखो ऑफिस से घर, घर से ऑफिस । बेचारा तेली के बैल की तरह जी रहा है।
67. तेते पाँव पसारिए जेती लाँबी सौर (आय के अनुसार व्यय करना चाहिए)-अपनी स्थिति की ओर ध्यान न देकर राम ने अपनी पत्री के विवाह पर इतना अधिक कर्ज़ ले लिया कि अब भुगतान करना मुश्किल हो रहा है। सच हा कहा है, तेते पाँव पसारिए जेती लांबी सौर।
68.थाली का बैंगन (अस्थिर बुद्धि वाला)-रतन पर विश्वास करना सही नहीं है, क्योंकि वह तो थाली का बैंगन है।
69. थोथा चना बाजे घना (आडंबरयुक्त व्यक्ति सारहीन होता है)-जेब में पाँच रुपये नहीं और लाखों की बातें कर रहाहै। सच है, थोथा चना बाजे घना।
70. दीवारों के भी कान होते हैं (गुप्त विचार-विमर्श एकांत में भी सावधान होकर करना चाहिए)-तुम जो कुछ भी बोल रहे हो सोच-समझकर बोलो। चाहे आस-पास खड़ा कोई भी न सुन रहा हो, लेकिन दीवारों के भी कान होते है ।
71. दूध का दूध पानी का पानी (पूर्ण न्याय)-राजा अकबर के दरबार में बीरबल अपनी चतराई के लिए प्रसिद्ध थे।वे दूध का दूध पानी का पानी, पल में ही कर देते थे। सादर के ढोल सहावने (जितनी प्रसिद्धि हो जाती है उतनी सत्यता पाई नहीं जाती। मैंने ताहारे चाचा जी की बहुतनारीफ सनी थी. लेकिन जब उनसे मिला तो उन्हें ठीक उसके विपरीत पाया। सच है, दूर के ढोल सुहावने होते हैं।
72. देखें ऊँट किस करवट बैठता है (न जाने क्या हो)-वर्ल्ड कप में इस बार लगभग सभी टीमें एक से बढ़कर एक नज़र आ रही हैं। देखें, ऊँट किस करवट बैठता है।
73. धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का (दोनों ओर से निराशा)-राजेश ने श्याम और रवि को आपस में लड़ाने के लिए दोनों के कान भर दिए, लेकिन श्याम और रवि ने मिलकर आपस में समझौता कर लिया। अब राजेश न श्याम का दोस्त रहा न रवि का। उसकी तो दशा ऐसी हुई मानो धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का
74. न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी (कलह की जड़ को काट देना)-प्रधानाध्यापक ने बदमाश अशोक को स्कूल से इसलिए निकाल दिया, क्योंकि न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी।
76. नाच न जाने आँगन टेढ़ा (काम करने का ढंग न मालूम होने पर बहाना करना)-यूँ तो वह बहुत बढ़-चढ़ कर बातें करता था, लेकिन समय आने पर बहाना बनाकर चला गया। सच है, नाच न जाने आँगन टेढ़ा।
77. निर्बल के बल राम (असहायों की सहायता ईश्वर करता है)-तुम पर जो विपत्ति आई है उसका सामना करो। किसी के पैरों में गिरने से क्या लाभ और फिर क्या तुम यह भी भूल गए हो कि निर्बल के बल राम होते हैं।
78. नौ नगद, न तेरह उधार (अधिक उधार बेचने से कम नगद बेचना लाभदायक है)-दुकानदार ने अपनी दुकान पर उधार माँगने आए ग्राहक से कहा कि नौ नगद, न तेरह उधार।
79. नौ सौ चूहे खा के बिल्ली हज़ को चली (पाप करके साधुता का ढोंग करना)-जवानी में तो दूसरों को सदैव ठगते रहे, अब मंदिर में बैठकर माला फेरते हो। कहना पड़ता है, नौ सौ चूहे खा के बिल्ली हज़ को चली।
80. पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं (गुलामी में कभी चैन नहीं)-जब हम परतंत्र थे तो यही कहा करते थे कि पराधीन Fi सपनेहुँ सुख नाहीं।
81. पर उपदेश कुशल बहुतेरे (दूसरों को उपदेश देना आसान है)-जब अपने-आप पर आन पड़ती है तब मनुष्य को सच्चाई का पता चलता है। वैसे पर उपदेश कुशल बहुतेरे।
82. पाँचों उँगलियाँ बराबर नहीं होतीं (सब आदमी समान नहीं होते)-यदि एक व्यक्ति ने तुम्हें धोखा दिया है तो क्या सभी पर भरोसा करना छोड दोगे। यह तो सही नहीं क्योंकि पाँचों उँगलियाँ बराबर नहीं होती।
83. बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद (अयोग्य व्यक्ति ज्ञान की बातें नहीं जानता)-इस अनपढ़ व्यक्ति को अपनी कविता सुनाने से क्या लाभ, बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद।
84. बाएँ हाथ का खेल (सुगम कार्य)-परीक्षा में सत्तर प्रतिशत अंक लाना तो मेरे लिए बाएँ हाथ का खेल है।
85. बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा (अचानक कोई लाभ होना)-वर्षा में वह दीवार अपने-आप ही गिर गई जिसे आप गिराना चाहते थे, बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा। 86. भागते भूत की लंगोटी भली (जो मिला वही बहुत)-अपने खोए हुए हज़ार रुपये में से जब श्याम को चार सौ रुपये प्राप्त हुए तो वह बोला-'भागते भूत की लंगोटी भली'
87. मन चंगा तो कठौती में गंगा (मन शुद्ध हो तो घर बैठे ही तीर्थ है)-क्या रखा है व्यर्थ पूजा-पाठ में। मनुष्य को अपना मन साफ रखना चाहिए। मन चंगा तो कठौती में गंगा।
88. मरता क्या न करता (विवशता में आदमी को कुछ भी करना पड़ता है)-पैसों की इतनी तंगी हुई कि पुरखों की जायदाद बेचनी पड़ी। मरता क्या न करता।
89. मुँह में राम बगल में छुरी (बाहर से अच्छा, दिल का काला)-आजकल मनुष्य की पहचान करना अत्यंत ही कठिनकार्य हो गया है। जिसे देखो मुँह में राम बगल में छुरी ही है।
90. मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक (जिसकी क्षमता जितनी हो, वह वहीं तक प्रयत्न करेगा)-वह मेरा क्या बिगाड़ सकताहै। ज्यादा से ज्यादा मैनेजर साहब से मेरी शिकायत कर देगा। मुल्ला की दौड़ मस्ज़िद तक।
91. यथा नाम तथा गुण (जैसा नाम वैसा आचरण)–नेकीराम ने यथा नाम तथा गुण उक्ति को चरितार्थ किया है अर्थात अपनी जिंदगी में बहुत लोगों का भला किया है। 92. लकड़ी के बल बंदर नाचे ( भय से ही काम होता है)-पिता जी के द्वारा डाँटे जाने पर रमेश काम पर जुट गया। सच है, लकड़ी के बल बंदर नाचे।
93. लेना एक न देना दो (कोई संबंध नहीं)-उसने मेरे साथ जो व्यवहार किया है, उसके बाद अब उससे मेरा लेना एक न देना दो।
94. साँप मरे न लाठी टूटे (बिना हानि के काम हो जाना)-यही तो तुम्हारी बुद्धि की परीक्षा है कि साँप मरे न लाठी टूटे।
95. सांच को आँच नहीं (सच्चे को किसका डर)-मुझ पर चाहे कैसा भी इल्जाम क्यों न लगाया जाए मुझे बिल्कुल भय नहीं। मैं जानता हूँ, साँच को आँच नहीं। 96. सोने पे सुहागा होना (अच्छी वस्तु में और गुण होना)-वह ईमानदार होने के साथ-साथ मेहनती भी है। इसे कहते हैं सोने पे सुहागा होना।
97. हथेली पर सरसों नहीं जमती (जल्दी में कोई काम नहीं बनता)-काम करने में समय लगता है, अधिक जल्दी हो तो किसी और से करवा लो। हथेली पर सरसों नहीं जमती।
98. हाथ कंगन को आरसी क्या (प्रत्यक्ष के लिए प्रमाण की आवश्यकता नहीं)-आप मेरी बात पर विश्वास नहीं करते तो चलिए, चल कर देख लीजिए। हाथ कंगन को आरसी क्या।
99. हाथी के दाँत खाने के और, दिखाने के और (कहना कुछ, करना कुछ)-तुम उसकी बातों में मत आना। वह बहुत चालाक है। हाथी के दाँत खाने के और, दिखाने के और वाली बात करता है।
100. हाथी का बोझ हाथी ही उठाता है (बड़ा काम बड़े ही कर सकते हैं)-राम ने जब रावण को मारा तब सबकी समझ में आया कि हाथी का बोझ हाथी ही उठा सकता है।
101. होनहार बिरवान के होत चिकने पात (होनहार के लक्षण प्रारंभ से ही प्रकट होने लगते हैं)-शशि को देखो पाँच वर्ष की है, लेकिन कितनी सुंदर चित्रकारी करती है। सच है, होनहार बिरवान के होत चिकने पात।
कुछ अन्य लोकोक्तियाँ
- अंधा क्या जाने बसंत की बहार - जिसने जो चीज़ देखी नहीं, वह उसकी विशेषता क्या जाने।
- अपना हाथ जगन्नाथ - स्वयं किया कार्य सबसे अच्छा होता है।
- अभी दिल्ली दूर है- अभी बहुत कार्य शेष है।
- आसमान की ओर थूका मुँह पर आता है - बड़ों की निंदा करने से स्वयं की ही हानि होती है।
- एक तंदुरुस्ती हजार नियामत - स्वास्थ्य बहुत बड़ी चीज है।
- एक तो चोरी, दूसरे सीना जोरी - अपराधी होकर उलटे रौब डालना।
- कड़वा थू-थू मीठा गप-गप- अच्छी चीज़ को लेना और बुरे को फेंक देना।
- करिए मन की सुनिए सब की - बात सबलागा को सुननी चाहिए पर अंतःकरण की माननी चाहिए।
- काजी जी दुबले क्यों ? शहर के अंदेशे से - व्यर्थ की चिंता करना।
- कौवों के कोसे ढोर नहीं मरते- बुरे आदमी के कहने से अच्छे आदमी की बुराई नहीं होता।
- गुरु गुड़ ही रहे, चेले शक्कर हो गए -चेला गुरु से भी आगे बढ़ गया।
- घर फूंक कर तमाशा देखना - शान के लिए औकात से बाहर खर्च करना।
- जंगल में मोर नाचा, किसने देखा? - योग्यता एवं वैभव का ऐसे स्थान पर प्रदर्शन, जहाँ कद्र करने वाला न हो।
- जिस बर्तन में खाना, उसी में छेद करना - कृतघ्न होना।
- जीती मक्खी नहीं निगली जाती- जान-बूझकर पाप नहीं किया जाता।
- जैसा देश, वैसा भेष - जहाँ रहो, वहाँ जैसी रीति पर चलो।
- जैसे नागनाथ, वैसे साँपनाथ- दोनों ही एक समान दुष्ट एवं भयंकर प्रकृति रखते हैं।
- तीन लोक से मथुरा न्यारी-सबसे पृथक् और अनोखा।
- नेकी कर दरिया में डाल - किसी का उपकार करके भूल जाना श्रेष्ठ है।
- नौ की लकड़ी नब्बे की ढुलाई - जितने मूल्य का सामान नहीं, उससे बहुत अधिक व्यय हो जाना।
- नौ सौ चूहे खा के बिल्ली हज़ को चली - जीवन भर बुरे कर्म करके अंत में संत बनने का ढोंग करना।
- पूत के पाँव पालने में पहचाने जाते हैं - होनहार के लक्षण बचपन में ही दिख जाते हैं।
- बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद -मूर्ख व्यक्ति गुण की सही परख नहीं कर सकता।
- बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा - अचानक लाभ होना।
- भागते भूत की लंगोटी भली - कुछ न मिलने से तो थोड़ा मिलना अच्छा है।
- मुद्दई सुस्त, गवाह चुस्त - जिसका काम हो वह सुस्त हो, दूसरे अधिक सक्रिय हों।
- मुर्गा बाँग न देगा तो क्या सुबह नहीं होगी - किसी एक व्यक्ति के न रहने से काम नहीं रुकता।
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