३४. संधि

 

 उपघटक - संधि

इसे जानें- 

संधि किसे कहते हैं?

संधि का अर्थ है जोड़। दो अक्षरों के पास-पास आने से बनने वाले अर्थपूर्ण शब्द को संधि अथवा जोड़ कहते हैं।

संधि के प्रकार

स्वर संधि

दो स्वरों के मेल को  'स्वर संधि' कहते हैं।

परमेश्वर

शब्द : परम + ईश्वर

वर्ण : म् +

अ + ई = ए

व्यंजन संधि

दो व्यंजनों अथवा एक व्यंजन और एक स्वर के मेल को 'व्यंजन संधि' कहते हैं।

(व्यंजन + व्यंजन/ व्यंजन + स्वर/स्वर + व्यंजन = व्यंजन)

जगन्नाथ

जगत् + नाथ त् + न् = न्

विसर्ग संधि

पहले शब्द के अंत में विसर्ग चिह्न आता है। इसे 'विसर्ग संधि  कहते हैं।

(विसर्ग + व्यंजन/  विसर्ग + स्वर)   

यशोधन 

यशः + धन  ⇒ विसर्ग

      जोड़ शब्दों में पहले शब्द का आखिरी वर्ण और दूसरे शब्द का पहला वर्ण एक दूसरे में मिल जाते हैं और इन दोनों के मिलने से एक वर्ण तैयार होता है। वर्गों के इस मेल को संधि कहते हैं।

संधि के प्रकार :

1) स्वर संधि : यदि पहले शब्द का अंतिम वर्ण स्वर और दूसरे शब्द का पहला वर्ण स्वर है तो इनके मेल से बननेवाले संधि को ‘स्वर संधि' कहते हैं।

2) व्यंजन संधि : पास-पास आनेवाले दोनों वर्गों में यदि दोनों व्यंजन हैं अथवा दूसरा वर्ण स्वर है तो इसे 'व्यंजन संधि' कहते हैं।

3) विसर्ग संधि : यदि पहले शब्द का अंतिम वर्ण विसर्ग और दूसरे शब्द का पहला वर्ण व्यंजन अथवा स्वर है तो उसे विसर्ग संधि कहते हैं।

संधि मिलनेवाले वर्ण संधि

स्वरसंधि

व्यंजनसंधि

विसर्ग संधि

 सूर्य + उदय

चित् + आनंद

 तपः + बल

अ + उ

त् + आ

विसर्गः + ब

सूर्योदय

चिदानंद

 तपोबल

स्वर संधि के प्रकार :

1) दीर्घ स्वर संधि : 

(अ) अ + अ = आ,

अ + आ = आ,

आ + अ = आ,

आ + आ = आ

विग्रहमिलनेवाले स्वरसंधि शब्द

दिव्य + अस्त्र

देव + आलय

विद्या + अर्थी

विद्या + आलय

अ + अ

अ + आ 

आ + अ

आ + आ

दिव्यास्त्र

देवालय

विद्यार्थी

विद्यालय

ब) इ + इ = ई ,

इ + ई = ई ,

ई + ई = ई ,

ई + इ = ई ,

विग्रहमिलनेवाले स्वरसंधि शब्द

 रवि + इन्द्र

 गिरि + ईश

 

 रवीन्द्र

गिरीश

ब) उ + उ = ऊ

उ + ऊ = ऊ,

ऊ + ऊ = ऊ,

 ऊ +  उ =ऊ  

विग्रहमिलनेवाले स्वर संधि शब्द

गुरु + उपदेश

 भू+ उद्धार

 उ+उ = ऊ

ऊ+उ= ऊ

गुरुपदेश

 भूद्धार

2) गुण संधि : 'अ' अथवा 'आ' के आगे 'इ' अथवा 'ई' आने पर 'ए' हो जाता है; 'उ' अथवा 'ऊ' आने पर 'ओ' तथा 'ऋ' आने पर 'अर्' हो जाता है।

विग्रहमिलनेवाले स्वर संधि शब्द

  शुभ + इच्छा 

गण + ईश 

 यथा + इष्ट 

 महा + ईश 

चंद्र + उदय 

जल + ऊर्मि

महा + उत्सव 

गंगा + ऊर्मि 

देव + ऋषि 

महा + ऋषि 

अ + इ= ए 

अ + ई = ए

आ + इ = ए 

आ + ई = ए 

अ + उ = ओ 

अ + ऊ = ओ 

आ + उ = ओ 

आ + ऊ = ओ 

अ+ ऋ = अर्

आ + ऋ = अर्

शुभेच्छा

गणेश

यथेष्ट

महेश

चंद्रोदय

जलोर्मि

महोत्सव

गंगोर्मि

देवर्षि

महर्षि

3) वृद्धि संधि : स्वर 'अ' अथवा 'आ' के आगे 'ए' अथवा 'ऐ' स्वर आए तो 'ऐ' और 'ओ' अथवा 'औ' स्वर आए तो 'औं' हो जाता है। उसे वृद्धि संधि कहते हैं।

विग्रहमिलनेवाले स्वर संधि शब्द

एक + एक 

मत + ऐक्य 

सदा + एव 

प्रजा + ऐक्य 

जल + ओघ 

 गंगा + ओघ 

महा + औषधि 

अ+ए = ऐ

अ+ ऐ = ऐ 

आ + ए = ऐ

आ + ऐ = ऐ

अ +ओ = औ 

आ + ओ = औ 

आ + औ = औ 

 एकैक

मतैक्य

सदैव

प्रजैक्य

जलौघ

गंगौघ

महौषधि

4) यण संधि:

(1) 'इ' अथवा 'ई' के बाद कोई विजातीय स्वर आए, तो 'इ' अथवा 'ई' के बदले 'य' हो जाता

(2) 'उ' अथवा 'ऊ' के बदले कोई विजातीय स्वर आता है, तो '3' अथवा 'ऊ' के बदले 'व' हो जाता है।

(3) यदि 'ऋ' के बाद कोई विजातीय स्वर आए, वो 'ऋ' के बदले 'र' हो जाता है।

विग्रहमिलनेवाले स्वर संधि शब्द

प्रीति + अर्थ 

अति + उत्तम

सु + आगत

मनु + अंतर

गुरु + ओदन 

 पितृ + आदेश 

इ+ अ = य्

इ+ उ = य

उ + आ = व्

उ + अ = व्

उ + ओ = व्

ऋ + आ = र्

प्रीत्यर्थ

अत्युत्तम

स्वागत

मन्वंतर

गुर्वोदन

पित्रादेश

(5) अयादि संधि - यदि 'ए', ऐ', 'ओ' और औ' के बाद कोई असवर्ण स्वर आए, तो -

(1) 'ए' का 'अय्' हो जाता है।

(2) 'ऐ' का आय' हो जाता है।

(3) 'ओ' का अव' हो जाता है

(4) ‘औ' का ‘आव' हो जाता

विग्रहमिलनेवाले स्वरसंधि शब्द

 ने + अन

गै + अन 

गो + ईश्वर

नौ + इक

ए + अ = अय्

ऐ + अ = आय 

ओ + ई = अव् 

औ + इ = आव्

नयन

गायन

गवीश्वर

नाविक

2) व्यंजन संधि

पहले शब्द का व्यंजन वर्ण और दूसरे शब्द का व्यंजन अथवा स्वर वर्ण मिलते हैं तो व्यंजन संधि होता है। जैसे- वाक् + ईश = वागीश

व्यंजन संधि के प्रमुख नियम

1) क्, च्, ट्, प् के आगे अनुनासिक को छोड़कर कोई स्वर अथवा किसी वर्ग के तीसरे या चौथे वर्णों अथवा य्, र्, ल्, व् में से कोई वर्ण आए तो क्, च्, ट्, प् के स्थान पर क्रमशः ग्, ज्, ड्, ब् हो जाता है।

उदाहरण -

विग्रह संधि में भाग लेने वाले वर्णसंधि शब्द

दिक् + विजय  

दिक् + भ्रम 

षट् + रिपु 

क् + व् = ग्

क् + भ् = ग्

र् + र् = ड्

दिग्विजय

दिग्भ्रम

षड्रिपु

2) क्, च्, ट्, त्, प् के आगे न् या म् अनुनासिक व्यंजन आए तो क्, च्, ट्, त्, प्  अपने वर्ग के पंचम वर्ण में बदल जाते हैं।

विग्रह संधि में भाग लेने वाले वर्णसंधि शब्द

उत् + नयन

अप् + मय

तत् + मय 

षट् + मास

 सत् + मति 

त् + न् = न्

प् + म् = म्

त् + म् = न्

ट् + म् = ण्

त् + म् = न्

उन्नयन

अम्मय

तन्मय

षण्मास

सन्मति

3) 'त्' के आगे कोई स्वर अथवा ग्, घ्, द्, ध्, ब्, भ्, य्, र्, व् में से कोई वर्ण आए तो 'त्' के स्थान पर द् ' हो जाता है।

विग्रहसंधि में भाग लेने वाले वर्णसंधि शब्द

उत् + घाटन

सत् + धर्म

तत् + रुप

सत् + आनंद

सत् + विचार

त् + घ् = द्

त+ध् = द्

त् + र् = द्

त् + आ = द्

त् +व्  = द्

उद्घाटन

सद्धर्म

तद्रूप

सदानंद

सद्विचार

4) त्' के आगे च या छ आने पर त्' के स्थान पर 'च् हो जाता है। ज्' या 'झ्' आने पर त्' के स्थान पर 'ज्' हो जाता है। 'त' के आगे 'ल' आने पर त्' के स्थान पर ल' हो जाता है।

उदाहरण

विग्रहसंधि में भाग लेने वाले वर्णसंधि शब्द

 सत् + जन 

उत् + लास

महत् + छत्र

उत् + चारण 

द् + ग् = ज्

त् + ल् = ल्

त् + छ = च्

त् + च = च्

सज्जन

उल्लास

महच्छत्र

उच्चारण

 5) यदि त्' के आगे

(1) 'श्' आए तो 'त' के स्थान पर 'च्' और 'श्' के स्थान पर 'छ' हो जाता है।

(2) 'ह' आए तो 'त्' के स्थान पर 'द्' और 'ह' के स्थान पर ध्' हो जाता है।

उदाहरण -

उत् + श्वास = उच्छ्वास

उत् + हार = उद्धार

3) विसर्ग संधि

जिस संधि में विसर्ग के साथ स्वर अथवा व्यंजन का मेल होता है, उसे 'विसर्ग-संधि' कहते हैं।

विसर्ग-संधि के नियम :

1) यदि विसर्ग के पूर्व 'अ' और बाद में कोई व्यंजन हो, तो 'अ' और विसर्ग (अः) के स्थान पर 'ओ' हो जाता है। जैसे-

अधः + गति = अधोगति।

2) यदि विसर्ग के पूर्व 'अ' और 'आ' को छोड़कर कोई अन्य स्वर हो, तो विसर्ग के स्थान पर र' हो जाता हैं। जैसे-

दुः + उपयोग = दुरुपयोग।

3) यदि विसर्ग के बाद 'श', 'ष' या 'स्' हो, तो विसर्ग के स्थान पर यही वर्ष हो जाता है अथवा विसर्ग बन जाता है। जैसे-

निः + संदेह = निस्संदेह।

4) यदि विसर्ग के पहले 'इ' या 'उ' हो और बाद में 'क्', 'ट्', ' ठ्  ',  प् '' और 'फ्' में से कोई वर्ण हो, तो विसर्ग के स्थान पर '' हो जाता है। जैसे-

निः + पक्ष = निष्पक्ष।

5) यदि विसर्ग के बाद 'च' या 'छ्' हो, तो विसर्ग के स्थान पर 'श्' हो जाता है। जैसे- निः + चल = निश्चल।

6) यदि विसर्ग के बाद 'त्' या 'थ्' हो, तो विसर्ग के स्थान पर ‘स्' हो जाता है। जैसे- मनः + ताप = मनस्ताप।

विसर्ग के अन्य उदाहरण : 

1) निः + तेज = निस्तेज

2) तेजः + मय = तेजोमय

3) अंतः + तल = अंतस्तल

4) पुरः + कार = पुरस्कार 

5) नमः + कार = नमस्कार

6) दुः + चरित्र = दुश्चरित्र

7) निः + रोग = निरोग

8) निः + भय = निर्भय

9) पुनः + आगमन = पुनरागमन

10) पुनः + विचार = पुनर्विचार

11) आविः + कार = आविष्कार

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