३१. अलंकार
उपघटक - अलंकार
अलंकार अर्थात आभूषण, गहना। जिस प्रकार शरीर सुंदर दिखने के लिए आभूषण धारण किया जाता है. उसी प्रकार भाषा को सुंदर बनाने के लिए कवि व लेखक अलंकार' का प्रयोग करते हैं।
शब्दालंकार और अर्थालंकार यह दो प्रमुख अलंकार हैं।
अलंकार के प्रकार
1) शब्दालंकार : शब्दालंकार के तीन प्रकार हैं।
1) अनुप्रास अलंकार : जब एक या अनेक वर्णों की आवृत्ति होती है, तो उसे 'अनुप्रास अलंकार' कहते है।
उदाहरण : खेदि खेदि खाति दीह दारून दलन के।
('ख' वर्ण की पुनरावृत्ति हुई है)
2) यमक अलंकार : जिसमें शब्दों की पुनरावृत्ति होती है और प्रत्येक शब्द के भिन्न-भिन्न अर्थ होते हैं। उसे 'यमक अलंकार' कहते हैं।
उदाहरण : काली घटा का घमंड घटा, नभ मंडल तारक वृंद खिले। (घटा' की पुनरावृत्ति हुई है, प्रत्येक के अलग-अलग अर्थ हैं)
3) श्लेष अलंकार : जब एक ही शब्द के अनेक अर्थ हो तो उसे 'श्लेष अलंकार' कहते हैं। उदाहरण : सुबरन को खोजत फिरत, कवि, व्यभिचारी, चोर। (सुबरन' के अनेक अर्थ हैं- सुंदर वर्ण, सुंदर रूप-रंग, स्वर्ण)
2) अर्थालंकार : अर्थालंकार के अनेक प्रकार हैं। किंतु यहाँ चार प्रकार दिए गए हैं।
1) उपमा अलंकार : जब एक वस्तु को दूसरे के समान बताया जाता है तो उसे 'उपमा अलंकार' कहते हैं।
उदाहरण : नीलिमा चंद्रमा जैसी सुंदर है।
('नीलिमा' और 'चंद्रमा' दोनों सुंदर हैं। अर्थात् दोनों में समानता बताई गई है)
2) उत्प्रेक्षा अलंकार : जब एक वस्तु में दूसरी वस्तु की संभावना व्यक्त की गई हो तो उसे उत्प्रेक्षा अलंकार कहते हैं।
उदाहरण : सोहत ओढ़े पीत पट, श्याम सलोने गात।
___मनहुँ नीलमणि सैल पर, आतप पर्यो प्रभात।।
(उपर्युक्त काव्य पंक्तियों में श्रीकृष्ण के सुंदर श्याम शरीर में नीलमणि पर्वत की और उनके शरीर पर शोभायमान पीतांबर में प्रभात की धूप की मनोरम संभावना अथवा कल्पना की गई है।)
3) रुपक अलंकार : जब एक वस्तु पर दूसरे वस्तु का आरोप किया जाता है, तो उसे रुपक अलंकार कहते हैं। उदाहरण : उदित उदयगिरि-मंचपर, रघुवर बाल-पतंग। विकसे संत-सरोज सब, हरये लोचन-भुंग। (इस दोहे में ‘उदयगिरि' पर मंच' का, 'रघुवर' पर 'बाल-पतंग' (सूर्य) का, 'संतों' पर 'सरोज' का एवं 'लोचनों' पर 'भृगों' (भौरों) का आरोप होने से रुपक अलंकार है।)
4) अतिशयोक्ति अलंकार : जहाँ किसी वस्तु, पदार्थ अथवा कथन का वर्णन आवश्यक सीमा से अधिक प्रस्तुत किया, तो वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार' होता है। उदाहरण : भूप सहस दस एकहिं बारा। लगे उठावन टरत न टारा।। (धनभंग के समय दस हजार राजा एक साथ उस धनुष को उठाने लगे, पर वह तनिक भी नहीं हिला। यहाँ कथन को आवश्यकता से अधिक बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया है।)
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